दोपहर के ठीक 12 बजे थे।
आसमान आग उगल रहा था। हवा में धूल इस तरह उड़ रही थी, जैसे पूरा गाँव अपने पुराने दर्द को हवा में बिखेर रहा हो। श्मशान घाट पर खड़े लोग बिल्कुल शांत थे। इतनी गहरी खामोशी थी कि लगता था जैसे वह भी अपनी कोई कहानी कह रही हो।
रोहित सबको देख रहा था और लोग रोहित को।
कुछ लोग आपस में धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे। चिता पूरी तरह तैयार हो चुकी थी। बस अग्नि देना बाकी था।
अमेरिका से यहाँ तक पहुँचने में लगभग 24 से 25 घंटे की उड़ान लगी थी। फिर वहाँ से अपने छोटे से शहर तक आने में 10 से 12 घंटे और लग गए थे।
शरीर थक चुका था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा थक चुकी थी आत्मा। आँखों के आँसू भी जैसे लंबे सफर में कहीं पीछे छूट गए थे।
राघव ने अंतिम संस्कार की सारी व्यवस्था संभाल रखी थी। लकड़ियाँ, पंडित, बैठने की जगह, जलपान और बाकी सभी जरूरी चीजें उसने खुद देखी थीं।
कुछ महीने पहले ही राघव ने एक छोटी-सी दुकान शुरू की थी, जहाँ वह अंतिम संस्कार से जुड़ी सभी व्यवस्थाएँ उपलब्ध करवाता था। यह उसके लिए सिर्फ एक व्यवसाय नहीं था, बल्कि लोगों के सबसे कठिन समय में उनके साथ खड़े होने का एक प्रयास था।
उसने बहुत मेहनत से अपनी इस नई शुरुआत को खड़ा किया था। शायद इसलिए वह जानता था कि किसी परिवार के लिए ऐसे समय में छोटी-छोटी व्यवस्थाएँ भी कितनी बड़ी मदद बन जाती हैं।
उस दिन भी उसने पूरी जिम्मेदारी से सब कुछ संभाला था, क्योंकि सामने केवल एक ग्राहक नहीं था, बल्कि उसके अपने गाँव का एक परिवार था।
उसने रोहित की तरफ देखा और धीरे से कहा,
“भैया, अंतिम संस्कार जल्दी कर लेते हैं। आपकी शाम की फ्लाइट भी है।”
रोहित ने बस सिर हिला दिया। कुछ देर बाद चिता में आग लगा दी गई।
धीरे-धीरे आग की लपटें उठने लगीं। लकड़ियों के टूटने की आवाज़ और रोहित के अंदर कुछ टूटने की आवाज़, दोनों एक साथ सुनाई दे रही थीं। कुछ समय बाद रोहित ने राघव को अपने पास बुलाया।
“राघव, कितना खर्च हुआ?”
उसने राघव की तरफ देखते हुए कहा,
“तुमने बहुत अच्छी व्यवस्था की है। एक लाख, दो लाख, जितना भी खर्च हुआ हो, मुझे बता दो।”
राघव कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने अपने बैग से एक पुरानी फाइल निकाली और रोहित की तरफ बढ़ा दी।
धीरे से बोला,
“भैया, सब पहले ही जमा हो चुका था।”
रोहित हैरान रह गया।
“किसने जमा किया था?”
राघव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“रामानंद जी ने।”
रोहित के हाथ वहीं रुक गए।
“पापा ने?”
राघव ने धीरे से सिर झुका लिया।
“हाँ भैया। करीब दो साल पहले वो बहुत बीमार हालत में हमारे ऑफिस आए थे। ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे। किसी के सहारे आए थे। उन्होंने हमें पचास हजार रुपये दिए थे।”
रोहित चुप हो गया।
राघव आगे बोलता गया,
“कुछ दस रुपये के नोट थे, कुछ पचास रुपये के नोट और कुछ सिक्के भी। उन्होंने अपनी जमा की हुई छोटी-छोटी बचत हमारे हाथ में रख दी थी।”
अब रोहित की नजर राघव पर नहीं थी।
वह जलती हुई चिता को देख रहा था।
राघव की आवाज़ फिर सुनाई दी,
“उन्होंने कहा था, मेरे मरने के बाद मेरा अंतिम संस्कार अच्छे से कर देना। अगर मेरा बेटा आए तो उसे जल्दी वापस भेज देना। उसकी वहाँ मीटिंग होगी। बच्चों का स्कूल होगा। वह यहाँ की गर्मी नहीं सह पाएगा। यहाँ की धूल और पानी की उसे अब आदत नहीं रही होगी। उसे बंद बोतल का पानी चाहिए होगा। उसे ज्यादा मत रोकना।”
इतना सुनते ही रोहित के हाथ से पानी की बोतल छूट गई।
वह अंदर तक कांप गया।
जिस पिता के लिए रोहित कुछ दिन भी नहीं निकाल पाया, वही पिता अपनी आखिरी इच्छा में भी बेटे की चिंता कर रहे थे।
उन्हें अपनी बीमारी की चिंता नहीं थी।
उन्हें चिंता थी कि रोहित की पत्नी उसका इंतजार कर रही होगी।
बच्चों का स्कूल छूट रहा होगा।
रोहित को परेशानी न हो जाए।
और रोहित…
वह सिर्फ पैसे भेजता रहा। उसकी आँखों के सामने बचपन के दृश्य घूमने लगे।
वह बारिश के दिनों में मिट्टी में खेलना।आंगन में नंगे पैर दौड़ना।भैंस का ताजा दूध निकालकर अपने हाथों से उसे पिलाना।
खेत से लौटते हुए पिता के कपड़ों में लगी मिट्टी की वह खुशबू, जो कभी उसे अपने घर की खुशबू लगती थी।
उस समय न बोतल का पानी था, न किसी चीज़ का डर। मिट्टी की खुशबू, घर का खाना और पिता के हाथों का प्यार ही उसकी दुनिया थी।
फिर पता नहीं कब अमेरिका की चमक में रोहित अपने ही घर से दूर होता चला गया।
अब गाँव का पानी उसे गंदा लगता था। धूल से एलर्जी होती थी। कच्चे दूध में उसे सिर्फ बैक्टीरिया दिखाई देते थे।
लेकिन सच यह था कि बीमार पानी नहीं था। बीमार तो उसकी सोच हो गई थी।
पैसा कमाते-कमाते रोहित इतना दूर निकल गया कि जिन हाथों ने उसे चलना सिखाया, उनके साथ बैठने का समय भी नहीं बचा।
हर रिश्ते का हिसाब पैसों में होने लगा था।
“कितना खर्च होगा?”
“हो जाएगा।”
लेकिन कुछ चीजें पैसों से पूरी नहीं होतीं।
कुछ रिश्तों को सिर्फ आपकी मौजूदगी चाहिए होती है।
चिता की आग अब धीरे-धीरे शांत हो रही थी।
लेकिन रोहित के अंदर पछतावे की आग पहली बार जलनी शुरू हुई थी।
यह सिर्फ रोहित की कहानी नहीं है।
यह उन हजारों लोगों की कहानी है जो अपने सपनों के पीछे विदेश चले गए, बड़ी सफलताएँ हासिल कीं, लेकिन धीरे-धीरे उन लोगों से दूर होते गए जिन्होंने उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया था।
कमाना गलत नहीं है। आगे बढ़ना गलत नहीं है। बदलना भी गलत नहीं है।
गलती सिर्फ इतनी है कि आगे बढ़ते-बढ़ते हम उन हाथों को पीछे छोड़ देते हैं, जिन्होंने हमें चलना सिखाया था।
यह एक काल्पनिक कहानी है। इसमें वर्णित सभी पात्र, स्थान और घटनाएँ रचनात्मक कल्पना पर आधारित हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति, परिवार या घटना से इसका कोई सीधा संबंध नहीं है। यदि कहानी के किसी हिस्से में वास्तविक जीवन की किसी परिस्थिति की झलक दिखाई देती है, तो वह केवल संयोग मात्र है। इस कहानी का उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय या जीवनशैली को आहत करना नहीं, बल्कि रिश्तों, परिवार और मानवीय भावनाओं के महत्व को उजागर करना है।
© विवेक दुबे
09 जुलाई 2026
डलास, टेक्सास, संयुक्त राज्य अमेरिका
