बहुत जल्दी करनी थी, पता ये देर से चला,
बीता वक्त न वापस आता, कितने सूरमा गाज़ी हो।

अच्छे-बुरे और अपना-पराया, इनमें हम मशरूफ रहे,
मेरी खुलूस खुद्दारी पर जख्म लगाते नाज़ी हो।

ऐ वतन तेरे सदके जाऊं, तेरी मिट्टी में जो जन्म लिया,
मौत को आए मौत जहां पर जान लगाती बाज़ी हो

नफ़रत की दीवार है ऊंची, ईश्क की सेंध लगानी है,
इल्म-ए-मोहब्बत बांटे जो, ऐसा भी इक क़ाज़ी हो।

दरिया-ए-इश्क में डूब कर होश सम्हाली जिम्मेदारी,
दुनियां से लड़ जाऊं मैं, साथ अगर तुम राज़ी हो।

हमनें जो तुमको खुदा माना, तुम हमको ही भूल गए,
जब संघर्ष हमारे हिस्से का तो खुशियां फिर क्यों साझी हों?

© त्र्यम्बक श्रीवास्तव

Categories: Poetries

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